मंगलवार, 7 नवंबर 2017

Chor Minar : Delhi

जून 2017 में नंदीकुंड ट्रैकिंग की पोस्ट लिखने में इतना व्यस्त हो गया कि मई 2017 में दिल्ली की एक अनजानी सी जगह से आपको परिचित ही नहीं करा पाया। असल में उस दिन मई के पहले सप्ताह का कोई दिन था और मैं आई. आई. टी. दिल्ली के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष ( H.O.D ) से मिलने गया था , मुलाकात आधा घंटे में ही खत्म हो गई तो बहुत समय बच गया आसपास की जगह देखने को। सबसे पहले जगह मिली "चोर मीनार ( 'Tower of Thieves') " ! भूल से चार मीनार मत पढ़ लेना , ये चोर मीनार ही है जो दिल्ली के हौज़ ख़ास में है। ज्यादा बेहतर लोकेशन नहीं मालूम लेकिन इतना पता है कि इसका रास्ता आई.आई.टी के बराबर से जाता है और फिर रवांडा देश के हाई कमिशन के दफ्तर के बिल्कुल अपोज़िट से एक और रास्ता जाता है। ये शायद अरबिंदो मार्ग है।

चोर मीनार ( Tower of Thieves):
चोर मीनार , 13 वीं शताब्दी में अलाउद्दीन ख़िलजी के समय में बनाई गई थी। कहा जाता है कि इस मीनार को चोरों को सजा देने और उनके सर काटकर यहां लगाने के लिए बनाया गया था , बोले तो शोकेस , जहां चोरों के सिर डिस्प्ले ( Display ) किये जाते थे जिससे और किसी की चोरी की हिम्मत न हो। इस मीनार की सबसे बड़ी खासियत इसमें बने 225 होल (Holes)  हैं , और ऐसा माना जाता है कि चोरों के सिर कलम करके इन छेदों में "सजा " दिया जाता था। इन छेदों में बड़े -नामी चोरों का सिर लटकाया जाता था जबकि छोटे -मोटे , उठाईगीरा टाइप के चोरों के सिर मीनार के बाहर पिरामिड (Pyramid ) की तरह बने ढ़ेर में फेंक दिए जाते थे।

अलाउद्दीन खिलज़ी की निर्ममता के किस्से तो वैसे ही बहुत मशहूर हैं , ये मीनार उसके 'कर्मों ' को दिखाती है और प्रमाणित करती है कि कितना भयानक मंजर रहता होगा जब इस मीनार के चारों तरफ , 225 इंसानी सिर बाहर निकलते होंगे , ओह !

हालाँकि कुछ इतिहासकार एक अलग कहानी बताते हैं , वो कहते हैं कि यहां अलाउद्दीन खिलज़ी ने उन मंगोल लोगों के सिर कलम कर दिए थे जो आज के मंगोलपुरी में रहने वाले अपने भाइयों -मित्रों से सम्बन्ध रखना चाहते थे। उनके सिर कलम करके यहां लटका दिए गए थे। वैसे पहली कहानी इसके नाम के साथ ज्यादा सटीक बैठती है। चोर मीनार के ही पास एक ईदगाह दिखाई दिया , क्या है ? क्यों है ? नहीं मालूम !! बस फोटो देखते जाओ जी ! चलो जी यहां तो हो गया , अब थोड़ा आगे चलते हैं और एक और अनजानी सी जगह देखते हैं :
















दादी -पोती  का मक़बरा ( Tomb of Grandmother & Grand daughter ):
ये जगह है "दादी -पोती " का मक़बरा , जो हौज़ ख़ास में जैसे ही घुसते हैं , सीधे हाथ पर हैं।  यहां दो मक़बरे हैं एक छोटा एक थोड़ा बड़ा।  वैसे बहुत ज्यादा अंतर नहीं है दोनों में लेकिन दोनों अलग -अलग हैं।  यहां किसकी कब्र है , किसने बनवाया , कुछ नहीं मालुम।  न मुझे मालूम न इतिहासकारों को।  छोटा वाला मक़बरा पोती का है जिसकी दीवारें कुछ ढलान लिए हुए हैं और इसकी छत कुछ विशेष प्रकार की है।  इसका गुम्बद 11.8 मीटर X 11.8 मीटर के साइज का है और ऐसा माना जाता है कि इसे तुग़लक़ के शासन के दौरान (1321 -1414 AD ) बनाया गया था। जबकि दूसरा वाला जो मक़बरा है वो दादी का मक़बरा कहा जाता है , इसके गुम्बद का साइज 15.86 मीटर X 15. 86 मीटर है और कहा जाता है कि इसे लोदी वंश के शासन काल ( 1451 -1526 AD ) में बनाया गया था।  कोई -कोई इतिहासकार इन दोनों जुड़वां गुंबदों को बीबी -बांदी का मक़बरा (  Mistress-Maid tombs) भी कहते हैं।  दादी का मक़बरा , पोती के मक़बरे की तुलना में ज्यादा बेहतर नजर आता है।  जहां पोती के मकबरे के अंदर की छत एकदम सपाट है वहीँ दादी के मक़बरे की अंदर की छत पर अरबी -फ़ारसी में कुछ लिखा हुआ है और दादी के मक़बरे में छह cenotaphs हैं तथा पोती के में तीन ही cenotaphs हैं।  अगर मौका मिले तो रात में देखिएगा से जब इस पर लाइट पड़ती है , और भी खूबसूरत दिखेगा। 






pc : so city.com
pc; tripoto


तो फिर मिलेंगे जल्दी ही , एक और नई कहानी के साथ

मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

Nandikund-Ghiyavinayak Trek : Banshi Narayan Temple to Kalpeshwar ( Day 8)

इस ट्रैक को शुरू से पढ़ने और पूरा शेड्यूल ( Itinerary ) जानने के लिए इच्छुक हैं तो आप यहां क्लिक कर सकते हैं !!


मुझे नहीं मालुम यहां बंशी नारायण मंदिर तक कितने लोग पहुँचते होंगे ? और कितने लोगों ने इसका नाम भी सुना होगा , सुना होगा तो ये मालूम होगा कि ये कहाँ है ? लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें ट्रैकिंग का जूनून होता है , मुझे नहीं ! मयंक की बात करिये जो हमें अकेले इधर से जाते हुए मिला ! घने जंगल में अकेला - मस्त मौला ! वो आज बंशीनरायण रुकेगा , हम वहां से चले आये ! लेकिन हम भी थोड़े से भाग्यशाली तो हैं ही , हमें भी बंशी नारायण दर्शन करने का मौका तो मिला ही और उस मंदिर पर एक रात बिताने का अवसर भी मिला !

आज 25 जून 2017 है और आज ये हमारा इस ट्रैक का आखिरी दिन है। सुबह करीब सात -साढ़े सात बजे शुरू हो गए चलना ! आज हम बंशी नारायण मंदिर से कल्पेश्वर मंदिर तक ट्रैक करेंगे और फिर वहां से जीप लेंगे , देखते हैं आज कहाँ तक पहुँचते हैं ! बंशी नारायण मंदिर लगभग 3600 मीटर की ऊंचाई पर है और कल्पेश्वर 2200 मीटर , तो समझ में आने वाली बात है कि आज इस लगभग 12 किलोमीटर की दूरी में हमें 1400 मीटर नीचे उतरना है। रास्ता एकदम आसान है लेकिन जंगलों से होकर है ! जंगल भी बहुत घने नहीं हैं , आसपास के गाँव के लोग भी मिलते रहते हैं ! जैसे ही जंगल खत्म होता है एक छोटा सा गाँव मिलता है "ओट ". यहीं एक बाबा का आश्रम है , जहां बाबा ने हमें मीठा शरबत पिलाया , आहाहा ! आत्मा तृप्त हो गई। यहां थोड़ी आराम किया और बाबा की अनुमति लेकर अखरोट के पेड़ से दो कच्चे अखरोट तोड़ लिए। बच्चों को दिखाने के लिए :) ! आगे रास्ता एकदम बना हुआ है और रास्ते में सेब के भी कुछ पेड़ देखने को मिलते हैं लेकिन वो रास्ते से कुछ दूर थे तो न तो फोटो ले पाए और न छूकर देख पाए। कोई नहीं फिर कभी ! अभी बहुत मौके आएंगे जीवन में ! चलते -चलते देवग्राम पहुँच गए ! देवग्राम , एक बड़ा गाँव है जहां रुकने -ठहरने को कुछ गेस्ट हाउस दिखाई देते हैं। यहां एक जगह सामान रखा और चल दिए भगवान् कल्पेश्वर के दर्शन करने ! आज आठ दिन बाद नहाएंगे , लेकिन शरीर से बदबू नहीं आ रही क्योंकि इस दौरान कभी भी , कहीं भी पसीना ही नहीं आया। लेकिन जब वहां इतना शानदार झरना हो तो कौन अपने आपको रोक पायेगा ? हम भी कैसे रुकते ? खूब देर तक नहाये और तब फिर भगवान के दर्शन को पहुँच गए।

कल्पेश्वर मंदिर , पंच केदार में से एक है जो उर्गम वैली में है। ये पाँचों केदार में से एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पूरे वर्ष खुला रहता है और यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां भगवान शिव की जटाओं को पूजा जाता है इसलिए कभी कभी भगवान शिव को जटाधर या जटेश्वर कहा जाता है। कल्पेश्वर की कहानी भी महाभारत और पांडवों से जुडी है , अगर आपने वो कहानी नहीं पढ़ी है , नहीं सुनी है तो यहां क्लिक करिये , आपको पूरी कहानी मिल जायेगी। यहां तक पहुँचने के लिए हेलंग से ल्यारी गाँव तक जीप मिल जाती हैं और फिर तीन किलोमीटर का ट्रेक है। हालाँकि जब हम लौट रहे थे तो रोड बनाई जा रही थी ! तो हो सकता है अगले वर्ष तक जब आप वहां जाएँ तो आपको जीप सीधे कल्पेश्वर मंदिर तक उतारे। दर्शन हो गए अब आगे चलते हैं और आगे ध्यान बद्री के दर्शन करते हुए चलेंगे।

ध्यान बद्री , ल्यारी गाँव से थोड़ा आगे और देवग्राम से पहले पड़ता है ! दूर से ही मंदिर दिखाई देने लगता है ! ये मंदिर कल्पगंगा नदी के किनारे अवस्थित है , बिल्कुल किनारे तो नहीं लेकिन मंदिर से लगभग 50 मीटर दूर पर ही कल्प गंगा नदी बहती हुई मिलती है और इसी नदी पर आगे जाकर कल्पेश्वर मंदिर भी है , जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। ध्यान बद्री मंदिर का सम्बन्ध उर्वा रिषि से मिलता है। पांडवों के वंशज राजा पुरंजय के पुत्र उर्व ने यहां भगवान विष्णु की तपस्या की थी और यहीं उनका मंदिर बनवाया था।

तो अब , ल्यारी पहुँच गए हैं और अमित भाई ने जीप बुक कर ली है हेलंग तक। हेलंग हरिद्वार - बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ से पहले एक छोटा सा क़स्बा है। हेलंग तो पहुँच गए लेकिन आगे ? चमोली के लिए न कोई बस , न कोई जीप। मैं और एक पोर्टर जोशीमठ गए , वहां से जीप में बैठकर आये और फिर चमोली पहुंचे। आज और आगे जाना संभव नहीं होगा तो आज यहीं रुकते हैं और ट्रैक सफल और सुरक्षित संपन्न होने की पार्टी करते हैं। रात भर भयंकर बारिश होती रही , रह रह के बादल डराते रहे लेकिन सुबह पांच बजे सब ठीक ठाक था। अब तो बस पकड़ो और ऋषिकेश पहुँचों। ऋषिकेश में जबरदस्त भीड़ और भीड़ से जबरदस्त जाम। जैसे तैसे बस मिली और बस में जगह भी जैसे -तैसे ही मिली। सुबह एक -डेढ़ बजे गाजियाबाद पहुँच गए।

अनुभव : इस ट्रैक में जो कुछ अनुभव किया वो आपको बताना चाहता हूँ। ये आसान ट्रैक नहीं है इसलिए कभी भी इसे अपने जीवन का पहला ट्रैक मत बनाइये , एक -दो ट्रैक आपने कर लिए हों इससे पहले और 4000 मीटर तक सकुशल और स्वस्थ रहे हों तो जरूर यहां के लिए सोचिये। अगर यहां जाने का मन है तो पूरा समय लेकर चलिए और 90 किलोमीटर के इस शानदार ट्रैक की खूबसूरती को महसूस करते जाइये। हमें आठ दिन लगे , न कोई भागमभाग और न किसी तरह की जल्दी। हमें कोई रिकॉर्ड नहीं बनाना होता है , कभी भी नहीं , हमें बस प्रकृति को देखना होता है , महसूस करना होता है। पहाड़ों को , पहाड़ी रीति रिवाज़ों को , उनके देवताओं को सम्मान देना जरूर सीखिए और साथ में अगरबती -धूपबत्ती के कुछ पैकेट्स रखकर ले जाएँ और जहां मंदिर दिखा दे , भगवान को धन्यवाद दीजिये कि आपको उसने विशेष कुछ दिया है इसीलिए आप वहां हैं।

इस ट्रैक में हम मद्महेश्वर , कल्पेश्वर जैसे पांच केदार के दर्शन कर पाए और एक बहुत ही पुराने मंदिर बंशी नारायण के भी , लेकिन इस ट्रैक में दिनेश , विजय और संजय जैसे सहयोगियों का साथ भी बहुत मायने रखता है ! सिर्फ सामान लेकर चलना या खाना बनाना ही नहीं बल्कि हमारे हर कदम पर उनका साथ चलना सराहनीय रहा !! धन्यवाद मित्रो !! 

बंशीनरायण मंदिर

बंशीनरायण मंदिर










कोई बता रहा था कि ये "जय " पुष्प है

ये क्या है ? मुझे नहीं मालुम

हाथी -घोड़ी पर्वत ! ज्यादा साफ़ नहीं दिख रहे थे बंशीनरायण से



ये बंशीनरायण मंदिर का शिखर है , जो कभी भूकंप से गिर गया था

























कल्पेश्वर मंदिर



कल्पेश्वर मंदिर

पलायन की कहानी दिखाते ये अकेले घर




ध्यान बद्री मंदिर



जय राम जी की !! बोल मद्महेश्वर बाबा की जय !!