सोमवार, 15 जनवरी 2018

The Labyrinth : Lucknow

भूलभुलैया : लखनऊ

लखनऊ की घुमक्कड़ी के किस्से को शुरू से पढ़ने के लिए यहां माउस चटकाएं या ऊँगली दबाएं !!


​बड़ा इमामबाड़ा देख चुका हूँ , यहां अच्छी खासी भीड़ है। शायद इतवार की वजह से हो ! हर एक कदम मुझे पिछली बार यहां आने की याद दिला देता है , तब मैं अपने दोस्तों के साथ था और आज अकेला हूँ। सीढ़ियों से ऊपर जाता हूँ लेकिन उधर से एक रेला सा चला आ रहा है , बुरका पहने कई सारी ख़्वातीन ​ऊपर से नीचे आ रही हैं तो लाजमी है कि नीचे से ऊपर जाने वालों को रुकना पड़ेगा। लखनऊ आइये तो एक बार बुरका स्टाइल और डिज़ाइन पर भी ध्यान दीजिये , आपको बड़े सलीकेदार बुर्के और सलीकेदार बुर्के वालियां दिखेंगी। तहज़ीब जैसे लखनऊ की दूसरी पहिचान हो , यहां की मुस्लिम महिलाएं शायद उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी महिलाएं होंगी। अब हमारा नंबर है ऊपर चढ़ने का , सीढ़ियां खूब चौड़ी हैं लेकिन फिर भी वन वे किया हुआ है ऊपर जाने -आने का रास्ता। जैसे ही सीढ़ियां शुरू होती हैं वहां एक बोर्ड लगा है जो "स्वच्छ भारत अभियान " का हिस्सा लगता है क्योंकि ये तब नहीं था जब हम पहले यहां आये थे 1997 में।


ऊपर भूल भुलैया है। अंग्रेजी में (the labyrinth ) कहते हैं। भूलभुलैया को आप लखनऊ की पहचान कह सकते हैं और कह क्या सकते हैं , है ही और तभी से है जब से ये नवाब साब ने बनवाया है। दो सौ साल से ज्यादा हो गए इसे बने हुए और आज भी ज्यों की त्यों जवान लगती है। हाँ कुछ कुछ ऐसे ही मेक अप उतर गया है जैसे किसी कमसिन ने मुंह धो लिया हो और क्रीम पाउडर की परत हट गई हो ! भूलभुलैया नाम से समझ में आ जाता है कि जहां आप खो जाएँ या रास्ता भूल जाएँ a place where you can forget directions and paths and get lost’.इसे बनवाने का किस्सा भी मजेदार और इंजीनियर की सोच का परिणाम है , ऐसा नहीं है कि यूँ ही बना दिया गया हो। ये किस्सा थोड़ी देर में सुनाता हूँ , उससे पहले ये बता दूँ कि इसमें एक जैसे 489 एक जैसे दरवाज़े हैं और एक जैसे हैं इसीलिए खो जाने का , रास्ता भूल जाने का डर रहता ही है। हालाँकि पता नहीं क्यों , भूलभुलैया मुझसे नफरत करती है , मैं हर बार यहां खो जाना चाहता हूँ , चिल्लाना चाहता हूँ कि मैं खो गया हूँ , कोई मुझे ढूंढ लो। .... लेकिन मैं कभी खोता ही नहीं। .... न इस बार। ... न तब ! I hate you Labyrinth क्योंकि तुम मुझे खोने नहीं देती but I love you too, I like you क्योंकि मुझे तुम्हें देखना , तुममें खो जाना पसंद है and so I am here in Lucknow in this summer . ये भी अच्छा है कि तुम केवल एक Structure वरना मेरी बीवी को तुमसे बड़ी नफरत होती !!

नवाब ! इधर यूपी में बहुत चलता है , मेरे अपने गाँव में भी ! किसी की लंका लगानी हो तो - बहुत बड़ौ नवाब है रह्यो है !! नवाब बन रहयो है !! जैसे मुहावरे प्रचलित हैं !!

पढोगे -लिखोगे बनोगे नवाब
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब


पहले यही चलता था लेकिन अब असली नवाब वो हैं जो खेल में नाम कमा रहे हैं। नवाब लखनऊ में भी हैं , कुछ शायद काम के भी हों लेकिन ज्यादातर नाम के ही हैं। अपने नाम के आगे बस नवाब लिख लेने से ये खुद को नवाब मान लेते होंगे जैसे नवाब फलाने अली खां , नवाब ढिकाने अली खां ! नवाब शब्द असल में फ़ारसी भाषा के शब्द "नायब " से आया है जिसका मतलब होता है डिप्टी (Deputy ) ! नवाब मुग़ल काल में अपने Deputy के रूप में मुग़ल शासकों द्वारा तय किये जाते थे और ये शब्द ज्यादातर उत्तर भारत में ही प्रयोग किया जाता था। यहां थोड़ी सी नोट करनी वाली बात ये है कि नवाब केवल पुरुष बनाये जाते थे और महिलाओं को बेग़म का ताज नवाजा जाता था। खैर इतना इतिहास मुझे भी नहीं पता लेकिन 1857 की क्रांति के बाद इन नवाबों के बुरे दिन आने शुरू हो गए और अब आज की तारिख में इन्हें कोई नवाब नहीं मानता। होगा तू अपने घर का नवाब !!

अच्छा हाँ , भूलभुलैया के बनने की कहानी भी तो लिखनी थी। भूलभुलैया , इमामबाड़े की ऊपर वाली मंजिल पर बना है और इमामबाड़े की बात तो आप पहले पढ़ ही चुके है कि क्यों और कैसे बना। इमामबाड़ा ऐसी जगह होती है जहाँ शिया मुस्लिम विशेष दिन आकर इबादत करते हैं , शायद मुहर्रम के दिन। इमामबाड़े एशिया के दूसरे अन्य मुस्लिम देशों में भी हैं लेकिन इनके नाम अलग -अलग हैं। बहरीन और UAE में इन्हें 'मातम " कहते हैं जबकि सेंट्रल एशिया के देशों में इसे "तकियाखाना " कहते हैं !! संभव है , मैं कहीं गलत हूँ तो अगर आपको मेरे तथ्य गलत लगते हैं तो कृपया सुधार करें। आपका स्वागत है।

तो क्योंकि इमामबाड़ा एक बड़ा सा हॉल है जिसमें कोई बीम नहीं लगी तो इसकी Ceiling को हल्का रखना था और ऊपर कुछ बनाना भी जरुरी था , तब आर्किटेक्ट हाफ़िज़ किफ़ायतुल्लाह ने ये डिज़ाइन तैयार किया जो कुछ Hollow हो , और इस तरह से ये भूलभुलैया का डिज़ाइन दुनिया के सामने आया। और हाँ , ये भी उसी तरह से बनाया गया जैसे इमामबाड़ा बनाया गया , मतलब अकाल पीड़ित लोगों को काम देने के लिए , जैसे आज की तारीख़ में मनरेगा (MNREGA ) से लोगों को काम दिया जाता है।

अकेले घूमने का एक नुकसान रहता है कि कोई फोटू खींचने वाला नहीं मिलता , सेल्फी का ज्यादा शौक नहीं पाला कभी। एक को कैमरा दिया कि भाई एक फोटू खेंच दियो ! ले लिए फोटो - शोटो ! अब चलता हूँ बाहर -एक कोई बावली भी है और स्नानघर भी है मुग़लों के ज़माने का। हाँ , यहां भूलभुलैया के बाहर जो खुला -खुला सा है वहां से लखनऊ बहुत सुन्दर दीखता है , उसे मिस मत करना कभी जाओ तो।

शाही बावली , सामने ही है। जिस तरफ से आप भूलभुलैया गए थे उसी तरफ कुछ आगे जाकर है ये। बावली , आपको पता ही होगा कि पहले के समय में पानी इकठ्ठा करने के लिए बनाई जाती थीं। हिन्दू शासक भी खूब बावली बनवाते थे और उम्मीद करता हूँ आप ने दिल्ली में उग्रसेन की बावली तो देखी होगी। इसके अलावा भी दिल्ली में बहुत सी बावली हैं , चाहें तो मेरी पोस्ट पढ़ सकते हैं। मैंने पांच बावली देखी हैं दिल्ली में अब तक। इसे भी नवाब असफउद्दौला ने बनवाया था और डिज़ाइन भी हाफ़िज़ किफ़ायतुल्लाह ने ही किया था।

चलो जी ! अब आगे चलता हूँ छोटा इमामबाड़ा घूमने ! तब तक आप ये फोटो देखते जाओ :
बस यही बदलाव आया है 1997 में और 2017 में ! तब ये बोर्ड यहाँ नहीं होता था





Red Carpet से हमारा स्वागत !! मोगैंबो खुश हुआ :)
भूलभुलैया से नीचे का विहंगम दृश्य










शाही बावली





अभी आगे चलेंगे : 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

Bada Imambada : Lucknow

पावन नगरी चित्रकूट के दर्शन कर , रात को ही ट्रेन पकड़ी और लखनऊ के लिए निकल गए। लखनऊ पहुँचते पहुँचते सुबह हो जानी है। दिन की शरीर जलाती गर्मी से रात में कुछ राहत मिली है और ट्रेन के चलने से थोड़ी ठण्डी ठण्डी हवा भी आ रही है। इस बीच कहीं से आँखों में नींद चली आई और दो घंटे की नींद भी अगर मिल जाए तो थकान दूर हो जाती है।
 

लखनऊ का चारबाग़ स्टेशन , अब कुछ अच्छा सा लगता है। लखनऊ में दो स्टेशन हैं , एक चारबाग़ और दूसरा लखनऊ जंक्शन। दोनों ही आसपास हैं तो ज्यादा भागदौड़ नहीं रहती। पहली बार लखनऊ को 1997 में देखा था , लेकिन तब ट्रेन से नहीं बस से आये थे झाँसी से। ये उन दिनों की बात है .... जब हम युवा हुआ करते थे 👦 पॉलिटेक्निक का दूसरा साल था और जनवरी का महीना था। हम अपने कुछ और साथियों के साथ लखनऊ के GPL ( Government Polytechnic Lucknow ) पहुंचे थे , 800 मीटर की रेस में State level खेलने के लिए। केवल एक ही इवेंट नहीं था , और भी बहुत सारे थे जिनमें से मुझे केवल दो में ही पार्टिसिपेट करना था। एक 800 Meter Race और दूसरा Debate Competition। बाकी कुछ मित्र भाला फेंक , 400 मीटर रेस , 100 मीटर रेस में पहुंचे हुए थे और कुछ खाली- पीली हम लोगों का उत्साह बढ़ाने गए , या ये कहें कि रोटियां तोड़ने और लखनऊ घूमने गए थे मुफ्त में😆। किराया लगना नहीं था किसी का भी , झाँसी से रात में बहुत सारी टूरिस्ट बसें निकलती थीं लखनऊ , जयपुर , ग्वालियर , आगरा , खजुराहो के लिए , तो उनमें ही हम भी बैठ जाते थे । लेकिन एक दिक्कत थी कि हमें केबिन में बैठना पड़ता था !! मुफ्त में केबिन में बैठना क्या बुरा है ? और हाँ , नाश्ता भी बस ड्राइवर -कंडक्टर ही कराते थे। इस चक्कर में हॉस्टल का शायद ही कोई छात्र होगा जिसने जयपुर , आगरा , खजुराहो न घूमा हो , मुफ्त में ही !! ऐसा कैसे ?? सवाल तो आ रहा होगा आपके मन में ? जरुरी भी है !! तो ऐसा इसलिए कि ये सारी बस हमारे हॉस्टल के सामने से निकलती थीं और अगर ये किसी स्टूडेंट को बिठाने से मना करते थे तो इनकी बस के कांच तोड़ देते थे हम सब हॉस्टल वाले। बेहतर यही था कि स्टूडेंट को केबिन में जगह दे दी जाए.... ... लेकिन अब 20 साल बाद वो सब बदल गया है।

तो जी लो आ गए लखनऊ । 16 अप्रैल का दिन है और सूरज अपने पूरे जोश में है लेकिन दोपहर बाद ही घूमने निकलना है , कुछ आराम तो हो ही जाएगा धूप से। दो बजे के आसपास फ्री हो गया तो पहली मंजिल इमामबाड़ा थी। चिलचिलाती धूप में E- रिक्शा में बैठा , उन पुराने दिनों को याद करता हुआ लगभग खाली सी रोड पर अपने आपको नवाबों के शहर में ले आया था। E- रिक्शा को हमारे अलीगढ -खुर्जा -बुलंदशहर में टिर्री बोलते हैं !! है न अजीब सा और रोचक सा नाम ! E-Rickshaw is called as Tirri in our Aligarh -Khurja -Bulandshahar  !!  इमामबाड़ा पहुँच रहे हैं तो आपको एक और कहानी सुनाता जाता हूँ। झाँसी के गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक में पढ़ाई करते हुए सेकंड ईयर में दिसंबर में कॉलेज लेवल पर स्पोर्ट्स मीट में हिस्सा लिया था और स्पोर्ट्स मीट में ही कुछ और भी कम्पटीशन हुए थे जिनमें एक्सटेम्पोर , डिबेट में मैं भी शामिल हुआ था और एक्सटेम्पोर में मुझे विषय मिला था " अगर आपको 20 लाख रूपये मिल जाएँ तो क्या करोगे "? जिन्हें मालूम है उनको धन्यवाद लेकिन जिन्हें नहीं मालूम उनके लिए बता दूँ कि एक्सटेम्पोर प्रतियोगिता में हमसे एक बाउल में से पर्ची उठवाई गई थी और पर्ची पर जो टॉपिक लिखा था उस पर तुरंत ही 2 मिनट की स्पीच देनी थी ! मैंने पता नहीं क्या क्या बना दिया उन 20 लाख में , मैंने कहा - मैं अस्पताल बनवाऊंगा , बच्चों के लिए स्कूल बनवाऊंगा ..... इतने में भीड़ में से आवाज़ आई ! अबे , तुझे 20 लाख मिले हैं , 20 करोड़ नहीं मिले !! परिणाम पता था कि हार जाऊँगा --- हार ही गया लेकिन इससे एक कॉन्फिडेंस आ गया बोलने का। और फिर जब डिबेट कम्पटीशन हुआ दो -तीन दिन बाद ... तो विपक्ष में हम विजेता थे !  विषय क्या था ? थोड़ा सा याद है - " औधोगीकरण का फायदा या नुकसान​ " । उस वक्त शायद नरसिम्हाराव की सरकार थी और डॉ मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। पक्ष में मित्र प्रवेश तिवारी विजयी हुआ था और विपक्ष में हम। दोनों ही मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे। अब अगला पड़ाव जोनल था और जोनल के लिए ​कानपुर​ जाना था। जोनल प्रतियोगिता HBTI ​कानपुर में थी ! वहां प्रवेश तिवारी ने मनमोहन सिंह को मनमोहन देसाई बोल दिया और मामला गड़बड़ हो गया। तब पक्ष में कोई भावना तिवारी विजयी हुई थी और विपक्ष में योगी आदित्यनाथ नहीं बल्कि योगी सारस्वत। हालाँकि प्रवेश बहुत अच्छा वक्ता था और उसे बाद में UP के तब के CM कल्याण सिंह जी ने सम्मानित किया था लेकिन उस वक्त वो पता नहीं कैसे फिसल गया। और इस तरह हम राज्य स्तर की डिबेट में पहुँच गए। लेकिन हाल फिलहाल हम इमामबाड़ा पहुँच गए हैं ! 

अब टिकट लगने लगा है और हरियाली भी पहले के मुकाबले कम हो गई है । लेकिन बदलाव सिर्फ इतना नहीं है ! अब बिल्कुल कमर्शियल कर दिया है इस जगह को। खैर , संभव है खर्च हो रहा है तो पैसा चाहिए और इसी के लिए टिकट तय किया गया हो ! लेकिन टिकट , विंडो पर क्यों नहीं मिलता ? जहां आप इमामबाड़ा में एंटर करते हैं वहीँ कुछ खाली - नल्ले से दिखने वाले चार -पांच लोग टिकट थमा देते हैं !!  पता नहीं टिकट वास्तव में लगता है ? या इन्होने कोई अपनी ही दुकान चला रखी है ?

लखनऊ , नवाबों और कबाबों का शहर ! मीनारों और गुम्बदों का शहर !! तहज़ीब और अदा का शहर !! स्वत्रंत्रता आंदोलन की चिंगारियों से रोशन होता हुआ आज भारत के सबसे बड़े राज्य की राजधानी और बिजलियों की चमक से जगमग करती विधानसभा। कुछ तो है इस शहर में !! भले यहां के मोनुमेंट्स मुस्लिमों ने बनवाये हैं लेकिन नफ़ासत ऐसी कि दिल प्रसन्न हो जाए। आज बस इमामबाड़ा की बात करते हैं : दो इमामबाड़े हैं इधर लखनऊ में ! एक बड़ा इमामबाड़ा दूसरा छोटा इमामबाड़ा ! बड़े की बात पहले कर लेते हैं क्योंकि पहले तो यही देखा है न ? ये वाला इमामबाड़ा 1784 ईस्वी में अवध के चौथे नवाब असफ़उद्दौला ने बनवाना शुरू किया था और 1791 में जाकर पूरा हुआ । ऐसा कहते हैं कि इसे बनाने में उस वक्त करीब 10 लाख रूपये खर्च हुए थे ! ठीक है ? लेकिन ये असल में एक एक्सीडेंटल मीनार है , मतलब बिना किसी जरुरत के बनवाई हुई मीनार। हुआ यूँ था कि एक बार बहुत ज्यादा अकाल पड़ गया और लोग भूखे मरने लगे तब नवाब साहब ने एक तरीका निकाला जिससे लोगों को काम भी मिल जाए और उन्हें ऐसा भी महसूस न हो कि उन्हें खैरात मिल रही है। इसके लिए नवाब साहब ने इस मीनार का निर्माण शुरू किया। एक मजेदार बात बताता हूँ - दिन में मजदूर जितना काम करते , रात में नवाब साहब के अधिकारी लोग आकर उसे गिरा जाते। न न गलत नियत से नहीं बल्कि इसलिए कि मजदूरों को और ज्यादा दिन लग जाएँ इसे पूरा करने में और उनके घर में चूल्हा जलता रहे !! वाह ! नवाब साहब !! बड़ा वाला सलाम है आपको !!

बड़ा इमामबाड़ा , लखनऊ की सबसे बढ़िया मोनुमेंट्स में मानी जाती है। इसमें अस्फी मस्जिद और भूल भुलैया के अलावा एक बावली भी है। ऐसा कहते हैं कि यहां भूल भुलैया में आने के 1024 दरवाजे हैं लेकिन जाने का केवल एक है !! मुझे तो नहीं दिखाई दिए 1024 दरवाज़े !! वैसे कभी कभी हांकने वाले कुछ ज्यादा ही हाँक देते हैं !! इस इमामबाड़े को हाफिज किफायतुल्ला ने डिज़ाइन किया था जो उस वक्त के बड़े आर्किटेक्ट माने जाते थे। इस 50 मीटर लंबे और 16 मीटर चौड़े हॉल में एक भी बीम नहीं लगाई गई है जबकि इसकी ऊंचाई भी 15 मीटर है। ये इस तरह का दुनिया का सबसे बड़ा हॉल माना जाता है जिसमें इतनी बड़ी मीनार में एक भी बीम नहीं लगाई गई ! इसे सेंट्रल हॉल कहते हैं और यहीं नवाब आसफुद्दौला का मकबरा है।


आज और नहीं लिखता , फिर पोस्ट बड़ी हो जायेगी: 

























मिलेंगे जल्दी ही एक और नई पोस्ट लेकर:

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

Chasing the footprints of Bhagwan Rama : Chitrakoot (Part-3)

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिये जहां आप जानकी कुण्ड और स्फ़टिक शिला के विषय में पढ़ सकते हैं !! ​

Hanuman Dhara :
गुप्त गोदावरी गुफाओं में घूम -घाम के , चोट खा के बाहर बैठ गया पेड़ों की छाँव में। अप्रैल की तेज़ गर्मी में पेड़ ऐसी ठण्डक दे रहे थे जैसे किसी ने कूलर रख दिया हो सामने ही , AC कहता तो कुछ ज्यादा हो जाता😋 ! आराम मिला तो अपना प्रिय पेय पदार्थ पिया।  जी , चाय ! मजा आ गया ! अब अंदर की गर्मी , बाहर की गर्मी का मुकाबला करने को तैयार है ! चल बाबू आगे चल !! चलो , हनुमान धारा चलते हैं ! ज्यादा पता नहीं था कि कैसे और कहाँ से होकर गए ? लेकिन रामघाट पहुंचे थे पहले फिर वहां से ऑटो लिया था। थोड़ा अलग हटकर है हनुमान धारा , लेकिन जगह बढ़िया लगी ! ऐसा तो नहीं कहूंगा कि इससे सुन्दर जगह नहीं देखी लेकिन मन को सुकून देने वाली जगह है।


सामने बहुत सारी सीढ़ियां दिखाई दे रही हैं , इन पर ही चढ़ के जाना है और ऊपर सूरज आज ही अपनी पूरी ताकत दिखा देना चाहता है। आदमी भी कौन सा कम है , उसने भी सूरज की गर्मी से निपटने को कई सारे यंत्र और कई सारे पेय पदार्थ ईजाद कर लिए। इनमें से ही एक कोल्ड ड्रिंक भी है , हालाँकि मेरा प्रिय पेय नहीं है लेकिन पीने से नफरत भी नहीं है। तो एक बड़ा सा घर देखा और उसके बरामदे में सजी दूकान। सजी क्या , सारा सामान इधर -उधर फैला पड़ा था लेकिन उस दुकान में घुसने का मतलब दूसरा था। कोल्ड ड्रिंक तो और भी कई दुकानों में मिल जाती लेकिन एक तो यहां कूलर चल रहा था और कूलर के सामने ही खाट पड़ी थी और खाट पर अमर उजाला !! अगर यही जगह दिल्ली में होती तो करोड़ों की होती लेकिन वहां चित्रकूट में उस घर की मालकिन दुकान चला रही है।..... छोडो यार ! अभी कोल्ड ड्रिंक और ब्रेड पकोड़ों पर concentrate करते हैं। अहाहा...  आनंद आ गया और आनंद के साथ -साथ डकार भी चली आई😀 । हरिओम !! श्री राधे !!

अब चलते हैं आगे ! मैं तो खैर सीढ़ियां ही चढ़कर जाऊँगा लेकिन अगर किसी को ऊपर जाने में परेशानी होती है , सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत होती है तो यहीं नीचे ही , जहां से सीढ़ियां शुरू होती हैं वहां कहार (porter ) भी मिल जाते हैं और ले जाने के लिए टोकरी भी। तो बड़े -बुजुर्गों को भी वहां तक पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं ! कहते हैं चित्रकूट में आज भी हनुमान जी वास करते हैं जहां भक्तों को दैहिक और भौतिक ताप से मुक्ति मिलती है। कारण यह है कि यहीं पर भगवान राम की कृपा से हनुमान जी को उस ताप से मुक्ति मिली थी जो लंका दहन के बाद हनुमान जी को कष्ट दे रहा था।

इस विषय में एक रोचक कथा है कि, हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा, लंका जलाने के के बाद शरीर में तीव्र अग्नि बहुत कष्ट दे रही है। तब श्रीराम ने मुस्कराते हुए कहा कि-चिंता मत करो। चित्रकूट पर्वत पर जाओ। वहां अमृत तुल्य शीतल जलधारा बहती है। उसी से कष्ट दूर होगा। ये वही हनुमान धारा है।

धूप इतनी तेज है कि कुछ कदम चलते ही हालत खराब हो जा रही है और ऐसे में एक पेड़ के नीचे एक 30 -32 साल का व्यक्ति बच्चों के खिलोने और छोटी -मोटी चीज बेच रहा है , मुझे यहां लगभग एक घंटा हो चुका है और मैंने कोई आदमी नहीं देखा यहां आते हुए , न जाते हुए ! क्या बिका होगा इसका ? क्या बिकता होगा ? मैंने 10 रूपये का कुछ लिया , बिना जरुरत के ही। आखिर तक पहुँच गया ऊपर। ऊपर मंदिर के पास एक -दो दुकान हैं पानी- कोल्ड ड्रिंक की , उस दुकान के बाहर ही एक माँ -बेटी सूखे बेर बेच रही हैं। 10 रूपये के ले तो लिए लेकिन ज्यादा स्वादिष्ट नहीं लगे। लू के थपेड़े गाल पर चुम्मी ले रहे हैं बार -बार और गाल लाल हो रहे हैं , ऐसे ही जैसे कभी स्कूल में मास्टर जी ने किये होंगे 😁!! थोड़ा इधर -उधर घूमा , चार पांच पुजारी मंदिर के अंदर आराम फरमा रहे हैं और दूर -दूर तक और कोई नहीं दिखाई दे रहा। यहां से करीब 100 फ़ीट दूर सीता जी की रसोई है उसे देखा , फोटो खींचे और नीचे उतरने लगा तब एक परिवार जाता हुआ मिला। मतलब दो -ढाई घण्टे में कुल चार लोग ! तीन वो , एक मैं। नीचे कई सारी महिलाएं भिक्षा के इंतज़ार में हैं।

Ramghat:
चलो अब वापस चलते हैं रामघाट ! रामघाट , मंदाकिनी नदी के किनारे के जो घाट हैं , उन्हें रामघाट बोलते हैं और ये एक ऐसी जगह है चित्रकूट की,  जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध होगी जहां तक मैं समझता हूँ। किनारे पर एक से एक सुन्दर मंदिर लेकिन उनके सामने से गुजरते बिजली के तार इन मंदिरों की फोटो लेने पर शोभा बिगाड़ देते हैं। कहते हैं भगवान श्री राम यहीं माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ स्नान के लिए आया करते थे। ऐसा माना जाता है कि रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास जी भी कुछ दिन यहां रहे थे और उन्हें भगवान श्री राम ने माता सीता और लक्ष्मण सहित दर्शन दिए थे। ये तो हुई पुरानी बात लेकिन नई बात ये है कि आप यहां बढ़िया नाव में बैठकर बोटिंग का आनंद उठा सकते हैं। बाकायदा हर बोट में बिस्तर लगा है और सोफे भी रखे हुए हैं , लेकिन चद्दरों और सोफे की हालत बता रही है कि बस इन चीजों को रखा गया है सजावट के लिए , बहुत बढ़िया तरह से न तो चादर बिछाई गई हैं और न सोफे इस तरह के हैं कि किसी को आकर्षित कर सकें। मैं किसी को दोष नहीं दे रहा क्योंकि इन्हें जितनी आमदनी होती होगी उसी हिसाब से ये अपनी नाव को सजायेंगे भी। अब ये आपके ऊपर भी निर्भर करता है कि आप हमेशा मॉल में ही जाते रहेंगे घूमने के लिए या अपने ग्रामीण भारत के भी दर्शन करना चाहते हैं जिससे उन्हें भी दो पैसे की कमाई हो सके और उनके बच्चों का भी पेट भर सके। मैं धन्य हुआ अपने प्रभु श्री राम के चरणों की धूल को माथे से लगाए कामदगिरि मंदिर की तरफ बढ़ता हूँ !!

Kamadgiri :
शाम घिर आई है लेकिन अँधेरा होने में अभी कुछ वक्त है तो चित्रकूट की सबसे प्रसिद्ध जगह "कामदगिरि मंदिर " देखने का लालच मन में आ गया। हालाँकि ज्यादातर लोग इसे सबसे पहले स्थान पर रखते हैं जब वो चित्रकूट आते हैं तो लेकिन मैंने दूर की जगहों को पहले देखना उचित समझा। आज की आखिरी जगह होगी "कामदगिरि " जहां मैं जाऊँगा। कामदगिरि एक पहाड़ है और उसी के नाम पर मंदिर भी है। रामघाट से करीब चार -पांच किलोमीटर दूर होगा। कामदगिरि एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब होता है : एक ऐसा पहाड़ जहां आपकी हर इच्छा , हर मनोकामना पूर्ण होती है। The Sanskrit word ‘Kamadgiri’ means the mountain which fulfills all yur wishes and desires. The place is believed to have been the abode of Lord Ram, Mata Sita and Laxman Ji during their exile. ऐसा माना जाता है कि जब भगवान श्री राम अपने वनवास के समय माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ चित्रकूट में रहे थे तब यहीं उनका ठिकाना हुआ करता था। कामदगिरि को 'कामतानाथ जी " के नाम से भी पुकारा जाता है और कामतानाथ जी , भगवान श्री राम का ही रूप माने जाते हैं। बहुत से श्रद्धालु कामदगिरि पर्वत की 5 किलोमीटर की परिक्रमा भी करते हैं और भरत कूप मंदिर इसी परिक्रमा के रास्ते में पड़ता है , हालाँकि मैं परिक्रमा नहीं कर पाया था तो सटीक जानकारी देना मुश्किल होगा।

तो भक्तो , असली वाले भक्तो हमारी आज की चित्रकूट की कथा यहीं संपन्न होती है। अब हम फिर से रात की ट्रेन से लखनऊ के लिए प्रस्थान करेंगे और फिर वहां से आपको लखनऊ की बात बताएँगे। तो भक्तो , कथा सुनने मतलब पढ़ने आना जरूर !! तो जोर से बोलिये : सियापति राम चंद्र की जय !! जय श्री राम !! 

गुप्त गोदावरी से निकलते हैं अभी.......
हनुमान धारा
हनुमान धारा.....
बड़े - बुजुर्गों के लिए दिक्कत नहीं है, इनका फायदा उठाइये
सीढ़ियां हालत खराब कर देती हैं






















मित्रो लखनऊ में मिलेंगे जल्दी ही: